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विकास में बदलाव की जरूरत है..!
ईश्वर ने हममें बदलने की क्षमता बनाई है..
परमेश्वर के स्वरूप में सृजित होने का एक हिस्सा यह है कि मनुष्य भौतिक या वस्तु वास्तविकताओं से अलग सोच सकता है, तर्क कर सकता है और निष्कर्ष पर पहुंच सकता है – हमारे मूल्य और कार्य परमेश्वर के वचन के अनुरूप बदलते हैं..
परिवर्तन एक आजीवन, दैनिक प्रयास है जो पवित्रता की अनन्त फसल के साथ समाप्त होगा।
जो चीज हमें बदलने से रोकती है वह हमारा गौरव है। हमारा अभिमान हमें अपने पाप को कम करने या बहाना या छुपाने के लिए बनाता है। या हम सोचते हैं कि हम अपने आप बदल सकते हैं..
हम अपने प्रयास से खुद को नहीं बदल सकते। इसके बजाय, हम विश्वास के द्वारा परमेश्वर द्वारा बदले जाते हैं..
हम नियमों और अनुशासनों से खुद को नहीं बदल सकते क्योंकि व्यवहार दिल से आता है। इसके बजाय परमेश्वर हमारे लिए मसीह के कार्य और हम में आत्मा के कार्य के द्वारा हमें बदलता है।
परमेश्वर हमारे पापों को हमारे जीवन से दूर करके और हमें मसीह में एक नया प्राणी बनाकर हमें शुद्ध करता है। इस जीवन में उसके लिए हमें जो होना चाहिए, उसे बनाने के लिए वह हर दिन हम पर काम करता है। हमारे जीवन में बहुत सी खामियां हैं, लेकिन ईश्वर प्रतिदिन हमें इन दोषों को बदलने और वह व्यक्ति बनने में मदद करते हैं जो वह चाहता है कि जब हम उसके अधीन हों।
ईश्वर कुछ भी बदल सकता है और किसी भी स्थिति को बदल सकता है। यीशु अभी भी कर सकते हैं। वह, वह कर सकता है जिसकी आवश्यकता है; वह वही कर सकता है जो जरूरी है। जब हम उस पर अपना विश्वास रखते हैं, तो वह उसे पलट सकता है..
परमेश्वर हमें अपने स्वरूप में आकार देता है। हमारे संघर्षों के बीच में, वह अपनी कृपा से हमारे दिलों को बदल देता है, ताकि हम सोचने, इच्छा करने, कार्य करने और बोलने में सक्षम हो सकें कि वह कौन है और वह क्या है। परिवर्तन की हमारी इच्छा परिवर्तन के लिए परमेश्वर के उद्देश्यों के अनुरूप होने लगती है।
जो लोग यीशु मसीह से जुड़े हुए हैं, उन्हें वास्तविक विकास के लिए कहीं और देखने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि स्वयं मसीह को देखने की आवश्यकता है। हम उन्हीं सत्यों की गहराई में जाकर बदलते हैं जिन्होंने हमें पहले स्थान पर बचाया।.
“परन्तु अनुग्रह में और हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के ज्ञान में बढ़ते जाओ। उसके लिए महिमा आज और हमेशा, दोनो के लिए ही होना है। आमेन…..”(2 पतरस 3:18)

Archives

November 3

Everyone must submit himself to the governing authorities, for there is no authority except that which God has established. The authorities that exist have been established by God. —Romans 13:1.

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November 2

Once you were not a people, but now you are the people of God; once you had not received mercy, but now you have received mercy—1 Peter 2:10. Excluded. Rejected.

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November 1

I pray also that the eyes of your heart may be enlightened in order that you may know the hope to which he has called you, the riches of his

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